Friday, April 11, 2008

shor

मेरे भीतर इतना शोर है
कि मुझे अपना बाहर बोलना
तक अपराध लगता है
जबकि बाहर ऐसी स्थिति है
कि चुप रहे तो गए।

8 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

सर साइलेंसर लगवा लीजिए न!

bezubaan hilsa said...

chup rahe to mare jayenge, bole to bhee marna tai hi hai...kya karein?

सुजाता said...

मेरी ही पंक्तियाँ मुझे ही सुनाईं .....
सच है ... भीतर भी बड़ा शोर है भई !

lalit said...

मैंने अपनी आवाज को
ढेर सारी आवाजों को
'मैनेज' किया इस तरह
इस तरह कि
लोगों ने कहा
बहुत कामयाब आदमी हो भई
कहाँ पता था मुझे
कि ये भिन-भिन करती
मधुमक्खियों की तरह
जमा लेंगी डेरा मेरे ही भीतर
और करेंगी मजबूर एक दिन
गला फाड़ के चिल्लाने को
बुक्का फाड़ के रोने को

सुभाष नीरव said...

दमदार बात कही है, इस छोटी-सी कविता में। पर सुजाता जी की टिप्पणी से प्रतीत होता है, जैसे ये पंक्तियां उनकी हैं। इसपर आपकी प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी, पर आप चुप हैं। और हाँ, कविता हिंदी में तो शीर्षक अंग्रेजी में देने की क्या विवशता रही, समझ नहीं आया।

Pradeep said...

अच्छी और गम्भीर कविता पर श्री इष्ट देव की फूहड़ टिप्पणी समझ में नहीं आई. और सुभाषजी की बात से मैं भी सहमत हूं.

- प्रदीप कान्त

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विष्णु नागर said...

Pradeepjee Ishtdevjee par naraz mat hoiye,unhone apnee tarah se tippani ki hai,aashai bura naheen hai.Subhashjee aapne bhee Sujataji ki tippani ko aksharashah le liya.Unka aashay hai ki unhen is kavita men apni baat sunaee dee.mujhe kisee bade videshi kavi ki kavita churane ki zaroorat naheen padi aaj tak to Sujata ki avita kyon churaoonga. Jahan tak sheershak angrejee men hone ka prashn hai,iskaa kaaran mera takneekee agyan hai, jise door kar loongaa. sabhee ko dhanyawad.