Wednesday, October 10, 2007

गिद्ध

गिद्ध
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शहीद का शव अभी -अभी घर लाया गया था ।
शव आया कि गिद्ध आये , नेता -मंत्री आये।हर गिद्ध शव पर चढाने के लिए अपने साथ पुष्प -गुच्छ लाया। पुष्पगुच्छ उठाने के लिए साथ में एक नौकर भी लाया।आंखों में आंसू जैसा कुछ लाया। चेहरे पर उदासी ओढ़ लाया।
गिद्ध ही गिद्ध थे चारों और। इतने गिद्धों को देख कर शहीद की विधवा और बच्चे डर
गए। वे रोना भूलकर घर की अंधेरी कोठरी में छुप गए।
न पुष्प गुच्छ ख़त्म हो रहे थे , न नेता,नहीं - नहीं गिद्ध।
इतने गिद्धों और इतने पुष्प गुच्छों से शहीद भी घबरा गया।वह मर चुका था , फिर भी उसका दम घुट रहा था। वह मरे -मरे ही चिल्लाया -बस करो गिद्धों , बहुत हो चुका , अगर तुम इसी तरह करोगे तो मेरे जैसे लोग देश के लिए शहीद होना बंद कर देंगे।
इतना कहकर वह चुप हो गया।मरा हुआ आदमी इससे ज़्यादा क्या बोलता।
मगर गिद्ध नहीं माने। उनके चेहरों पर उसी तरह की प्रोफेशल उदासी और आंसू थे और उसी तरह उनके कपडे सफ़ेद थे। एक गिद्ध ने धीरे से कहा - अब हम इतना समय बरबाद कर के आये हैं तो चाहे जो हो जाये , पुष्प गुच्छ चढ़ाकर और सिर नवाकर ही जायेंगे। हमारी भी मजबूरी है , जनता क्या सोचेगी हमारे बारे में? जिसको भविष्य में शहीद होना हो , हो , न होना हो , न हो, अपनी बला से।
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6 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत बढ़िया...

गिद्ध तो अच्छे होते हैं, जो मरने के बाद आते हैं....लेकिन 'गिद्ध'? ये ख़ुद मारते हैं और......

सर,
ये कमेंट बॉक्स हटा दीजिये. हमें तो बस आपकी कवितायें पढ़ने का मौका दीजिये...क्योंकि, आपकी कविताओं पर कमेंट लिखने लायक 'हम' तो नहीं हैं...

बोधिसत्व said...

करारा व्यंग......अच्छा लग रहा है आपतो ऐसे पढ़ना

सुभाष नीरव said...

"गिद्ध" एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी है। व्यंग्य मारक है, पर क्या ही अच्छा होता यदि इस मारक व्यंग्य को सही मायने में एक लघुकथा का रूप मिल पाता।
सुभाष नीरव
9810534373

Ek ziddi dhun said...

Ye ajeeb baat hai ki sahi mayne mei.n laghukatha ka roop mil pata ise....Parsai ki rachnao.n ko bhi is tarha mushkil ho jaata hai kisi khas chaukhte mei.n kaid kar dekh pana...Gidh ka vyangya darasal Nagar G ki khas shaili ka hi namoona hai, anootha aur marak

Hemendrakumar said...

व्यंग्य लाजवाब है,
छोटे मुँह बड़ी बात किन्तु मन में आया इसलिए लिख रहा हूँ - यदि आप नेता, मंत्री, शब्दों का उपयोग नहीं करते तो शायद रचना और वज़नदार होती।
हेमेन्द्र कुमार राय

चंदन कुमार मिश्र said...

गिद्ध अभी शेष हैं!