Saturday, October 6, 2007

लघुकथायें

ईश्वर की लाचारी

सपने में वह सब कुछ हासिल कर लेता है ।वह लंदन,न्यूयॉर्क , पेरिस चला जाता है,वहां सबसे फर्राटेदार अंगरेजी में बातें कर्ता है , सूट-टाई पहनता है ,नाईट क्लबों में जाता है , लाईव शो देखता है,गोरी औरत के साथ रात बिताता है लेकिन सपने में भी एक बात नहीं हो पाती है। वह सपने में अपने को अंग्रेज जैसा गोरा देखना चाहता है और लाख कोशिशों के बाद वह नहीं हो पाता है ।
उसने क़सम खाई है कि कम से कम वह सपने में तो अपने को गोरा देखकर ही रहेगा। इसके लिए वह दान -पुण्य,हवन -जाप सब कुछ कर रहा है । उसे विश्वास है कि ईश्वर एक न एक दिन उसकी मदद ज़रूर करेगा।
ईश्वर बेचारा उसे कैसे बताये कि वह भी उसकी मदद नहीं कर सकता।
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चिम्पाजी
मैंने कहीं पढा कि एक चिम्पाजी , दूसरे चिम्पाजी से मिलने पर हाथ मिलाता है।
चलो मेरी यह शर्म दूर हुयी। आज तक मैं यही समझता था कि हम हिंदुस्तानी , अंग्रेजों की नक़ल में एक -दूसरे से हाथ मिलाया करते हैं। अब पता चला कि हम तो अपने पूर्वजों के बनाए रास्ते पर ही चल रहे हैं ।

5 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

लेखक के व्यंग्य कार होने का असर इन कथाओं पर साफ दिख रहा है. बधाई. थोड़े में बड़ी बातें हुई हैं.

बोधिसत्व said...

अच्छा है सर लगे रहें.....बात बनती सी दिख रही है....

विष्णु नागर said...

Ishtdevjee aur Bodhisatvjee
Tippanee ke liye bahut dhanyawad.

dipti said...

भारतीय़ मानसिकता का इससे सरल वर्णन शायद ही कभी हुआ होगा।
बधाई हो।

दीप्ति।

चंदन कुमार मिश्र said...

चिम्पांजी की कथा जानकर मैं भी आपकी तरह समझ गया।