Friday, April 11, 2008

shor

मेरे भीतर इतना शोर है
कि मुझे अपना बाहर बोलना
तक अपराध लगता है
जबकि बाहर ऐसी स्थिति है
कि चुप रहे तो गए।

Friday, April 4, 2008

गलतियाँ

गलतियाँ करना कभी बंद नहीं होता
और उन्हें ठीक करना भी
नई के साथ पुरानी गलतियाँ भी हम करते हैं
और हर गलती न ठीक हो सकती है
और न हम ठीक कर पाते हैं, न करना चाहते हैं
कुछ गलतियाँ करके हम पछताते हैं
और कुछ गलतियाँ हम जान बूझकर करते हैं
जैसे कि किसी यह कह देना कि यार मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
कुछ गलतियों के बारे में हमें कभी पता नहीं चलता
कई बार तो बताने पर भी हम यह जान नहीं पाते

बहरहाल मैं कसम खाता हूँ कि जब तक जिंदा हूँ गलतियाँ करता रहूँगा
अगर मैं अपनी किसी भी गलती के लिए माफी न मांगूं
तो समझना कि मैं हूँ नहीं।

Monday, March 24, 2008

ईश्वर और चुनाव

ईश्वर ने तीन बन्दर देखे। उन्होंने देखा कि एक बन्दर देखता और सुनता तो है मगर बोलता बिल्कुल नहीं है।
दूसरा बन्दर देखता और बोलता है मगर सुनता बिल्कुल नहीं है।
तीसरा बन्दर बोलता और सुनता है मगर देखता बिल्कुल नहीं है।
ऐसे बंदरों को देखकर आश्चर्यों के भी आश्चर्य ईश्वर को आश्चर्य हुआ और उन्होंने इन बंदरों के बारे में जिज्ञासा प्रकट की।
उन्हें मालूम हुआ कि ये गांधीजी के बन्दर हैं। दुनिया से कूच करने से पहले गांधीजी इनसे कह गए थे कि तुम्हें भविष्य में सुखी रहना है तो ऐसे ही रहना। इस बात का महत्व तुम आज नहीं समझोगे मगर जैसे-जैसे इस देश में चुनाव होते जाएंगे और लोकतंत्र `मजबूत` होता जाएगा, वैसे-वैसे तुम्हारे सामने मेरे कथनों की सच्चाई भी प्रकट होती जाएगी।
और एक दिन ऐसा आएगा कि तुम्हीं भारत के मनुष्य के आदर्श माने जाओगे। फिर एक दिन ऐसा भी आएगा कि मनुष्य फिर से बन्दर बनना चाहेगा।

Tuesday, March 18, 2008

चुहिया और बिलाव की प्रेमकथा

एक चुहिया अपने बिल से बाहर निकलने ही वाली थी कि उसकी नज़र बिलाव पर पड़ी, जो कि बाहर ही खड़ा था। चुहिया ने खुदा का शुक्र माना कि उसकी जान बच गयी।
वह बिल में खड़ी-खड़ी बिलाव के जाने का इन्तजार करने लगी। बिलाव मगर जमा हुआ था।टस से मस नहीं हो रहा था।
चुहिया एकटक बिलाव को देखे जा रही थीकि यह मरा कब जाए और वह कब बाहर निकले। धीरे-धीरे वह भूल गई कि यह बिलाव है और वह स्वयं चुहिया है और दोनों में छत्तीस का आंकडा है। वह बिलाव के काले-सफ़ेद रंग, उसकी पीली-चौकन्नी आंखों, मूछों, खड़े कानों, लंबे पैरों, ऊंचे कद पर मोहित हो गई। उसे महसूस हुआ कि यह है असली मर्द। एक मेरा चूहा है। बिल्कुल बेकार। दो कौड़ी का।
वह बिलाव के प्रेम में दीवानी हो गई और निकल गई साजन से मिलने।
लेकिन बेचारे बिलाव को चुहिया का हाले दिल क्या मालूम? उसे तो पता था कि वह बिलाव है और यह चुहिया है। उसका शिकार करना ही उसका धर्म है।
बिलाव अपना धर्म निबाहने के लिए लपका। उधर चुहिया कहती रही- ``बिलाव, माई लव। ``

Saturday, March 15, 2008

दुःख

जब मैं अपने दुखों की बात कर रहा था
उन्होंने कहा- करो और करते जाओ
ये हमारे दुःख भी हैं
मैंने अपने सुखों के बारे में कहा तो
उन्होंने नहीं कहा, ये हमारे भी हैं।

घर-बाहर

मेरा घर
मेरे घर के बाहर भी है
मेरा बाहर
मेरे घर के अन्दर भी

घर को घर में
बाहर को बाहर ढूंढकर
मैंने पाया
मैं दोनों जगह नहीं हूँ

Thursday, January 17, 2008

pakadamapatee

jab आप पैसे के पीछे भागते हैं और भागते चले जाते हैं तो एक दिन ऐसा आता है कि पैसा खुद आपके पीछे भागना शुरू कर देता है और तब आप इसलिए भाग रहे होते हैं कि पैसा आपके पीछे आपको पकड़ने की कोई जल्दी नहीं होती , वह तो बस इतना चाहता है कि आप लगातार भागते रहें और आप इस भ्रम में बने रहें कि वह आपको पकड़ना चाहता है और आप हैं कि उसकी पकड़ में नहीं आ रहे हैं । वह अपनी उदारता दिखाने के लिए यह तक करता है कि जब आप दौड़ते-दौड़ते गिर जाते हैं तो वह आपको उठाने का मौका देता है ताकि आप फिर से भाग सकें और वह आपको पकड़ने के लिए आपके पीछे भाग सके ।
वह आपकी मृत्यु तक आपका पीछा नहीं छोड़ता और यह तो मरनेवाला ही बता सकता है कि -जो कि वह नहीं बताता -कि उसके बाद भी वह पीछा छोड़ता है या नहीं लेकिन तत्वदर्शी बताते हैं कि पैसा इतना क्रूर होता है कि वह मरे हुए को भी नहीं छोड़ता।
मरा हुआ भी उसके डर से अनंतकाल तक भागता रहता है।वह इतना डर जाता है कि दुबारा मरना चाहता है लेकिन एक बार मरने के बाद दुबारा मृत्यु कहाँ ?दौड़ते- दौड़ते यह हालत हो जाती है कि मरने वाले को यह याद भी नहीं रहता कि वह क्यों और किस के डर से भाग रहा है मगर वह भागता चला जाता है जाने किन-किन नक्षत्रों को पार करते हुए ,बिना उनको देखे,बिना उनको जाने। वह सांस तक नहीं ले पाता,पसीना तक पोंछ नहीं पाता। इस तरह होते-होते एक दिन वह उल्कापिंड की तरह पृथ्वी पर गिर पङता है और तब जाकर उसे मुक्ति मिलती है क्योंकि पैसे की पकड़ से मुक्ति की भी पूरे ब्रह्मांड में एक ही जगह है- पृथ्वी।